अपनी मन की बात – आजकल

जब हम छोटे बच्चे थे, हमें भूत का हव्व देकर हमें डराया जाता था. आजकल डेवेलपमेंट का हव्व देकर हमें प्रोत्साहित किया जा रहा है. है दोनो हव्वे ही! क्योंकि ना तो बचपन में भूत प्रेत थे, और ना ही आज डेवेलपमेंट है. कोशिश ज़रूर जारी है, मगर सच तो यह है की सरकार की हर एक विधि निर्माण में विकास की अपरोक्ष रूप के पीछे, प्रच्छन्न रूप मे निजी स्वार्थ का साया है. असहाय लोगों की मदद की बजय, उनके तन मे बसी कपड़े भी नोच फाड़ने के एक दुस्वार्थ नज़र आता है. पुरानी सरकारें जब बहुमत मे आती, तो बदलाव की हवा अच्छाई की तरफ़ नहीं, तो कम से कम, बुराई की तरफ तो नहीं जाती थी. यह सरकार तो किसानों के साथ धोके पर उतर आई है. ना तो MSP के मामले पर, और ना ही Land Acquisition के मसले पर, सरकार की नीयत ठीक लगती है. जो वादे चुनावी भाषणों मे खिले थे, वे आज सरकारी धोंस के नीचे मुरझा रहे हैं. आम जनता की प्रत्यशाओं को ठेस पहुँचा है. सरकार को चाहिए की बेबुनियाद वाद विवादों मे ना फस्कर, अपनी अभिरुचि क्रियात्मक तथा जन कल्याण हेतु विधि निर्माण में लगाए. प्रधान मंत्री ने अपनी मन की बात तो हमें बता डाली. हमने अपनी भी. मगर कहीं कुछ मिलाप नज़र नहीं आ रहा. नौ महीने ज़्यादा वक़्त बेशक ना हो, मगर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए, की अपनी कार्यकाल के 15% गवा चुकी है.